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कर्ण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
तथापरेषामृषिसत्तमानां; श्रुत्वा गिरं पूजय़तां सदैव |  १२   क
न संनतिं प्रैमि सुय़ोधनस्य; न त्वा जानाम्याधिरथेर्भय़ार्तम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति