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कर्ण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
धनुश्चैतत्केशवाय़ प्रदाय़; यन्ताभविष्यस्त्वं रणे चेद्दुरात्मन् |  १४   क
ततोऽहनिष्यत्केशवः कर्णमुग्रं; मरुत्पतिर्वृत्रमिवात्तवज्रः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति