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कर्ण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
प्रच्छादितं वडिशमिवामिषेण; प्रच्छादितो गवय़ इवापवाचा |  ५   क
अनर्थकं मे दर्शितवानसि त्वं; राज्यार्थिनो राज्यरूपं विनाशम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति