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कर्ण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
अय़ं जेता खाण्डवे देवसङ्घा; न्सर्वाणि भूतान्यपि चोत्तमौजाः |  ७   क
अय़ं जेता मद्रकलिङ्गकेकय़ा; नय़ं कुरून्हन्ति च राजमध्ये ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति