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कर्ण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
कान्त्या शशाङ्कस्य जवेन वाय़ोः; स्थैर्येण मेरोः क्षमय़ा पृथिव्याः |  ९   क
सूर्यस्य भासा धनदस्य लक्ष्म्या; शौर्येण शक्रस्य वलेन विष्णोः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति