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शल्य पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेष्ट्वा भगवाञ्ज्योतिर्भास्करो राजसत्तम |  १७   क
ज्योतिषामाधिपत्यं च प्रभावं चाभ्यपद्यत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति