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शल्य पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नः शुकश्चैव कृष्णश्च मधुसूदनः |  १९   क
यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशां पते ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति