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शल्य पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ह्यमरराजोऽसावीजे क्रतुशतेन ह |  २   क
वृहस्पतेश्च देवेशः प्रददौ विपुलं धनम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति