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शल्य पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र हत्वा पुरा विष्णुरसुरौ मधुकैटभौ |  २१   क
आप्लुतो भरतश्रेष्ठ तीर्थप्रवर उत्तमे ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति