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शल्य पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
असितो देवलश्चैव तस्मिन्नेव महातपाः |  २३   क
परमं योगमास्थाय़ ऋषिर्योगमवाप्तवान् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति