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शल्य पर्व
अध्याय ४८
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वैशम्पाय़न उवाच
तान्क्रतून्भरतश्रेष्ठ शतकृत्वो महाद्युतिः |  ४   क
पूरय़ामास विधिवत्ततः ख्यातः शतक्रतुः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति