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वन पर्व
अध्याय २५६
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वैशम्पाय़न उवाच
समुद्यम्य च तं रोषान्निष्पिपेष महीतले |  ३   क
गले गृहीत्वा राजानं ताडय़ामास चैव ह ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति