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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
ततोऽर्जुनस्य वाहूंस्तु छित्त्वा वै पौरुषान्वितः |  ४१   क
तं रुवन्तं ततो वत्सं जामदग्न्यः स्वमाश्रमम् |  ४१   ख
प्रत्यानय़त राजेन्द्र तेषामन्तःपुरात्प्रभुः ||  ४१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति