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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
स तथा सुमहातेजाः कृत्वा निःक्षत्रिय़ां महीम् |  ४७   क
कृपय़ा परय़ाविष्टो वनमेव जगाम ह ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति