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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
ततो वर्षसहस्रेषु समतीतेषु केषुचित् |  ४८   क
क्षोभं सम्प्राप्तवांस्तीव्रं प्रकृत्या कोपनः प्रभुः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति