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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
जातं जातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह |  ५५   क
अरक्षंश्च सुतान्कांश्चित्तदा क्षत्रिय़योषितः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति