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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
ततः शूद्राश्च वैश्याश्च यथास्वैरप्रचारिणः |  ६१   क
अवर्तन्त द्विजाग्र्याणां दारेषु भरतर्षभ ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति