शान्ति पर्व  अध्याय ४९

वासुदेव उवाच

रक्षिणश्च समुद्दिश्य प्राय़ाचत्पृथिवी तदा |  ६५   क
प्रसाद्य कश्यपं देवी क्षत्रिय़ान्वाहुशालिनः ||  ६५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति