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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
अस्ति पौरवदाय़ादो विडूरथसुतः प्रभो |  ६७   क
ऋक्षैः संवर्धितो विप्र ऋक्षवत्येव पर्वते ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति