कर्ण पर्व  अध्याय २६

सञ्जय़ उवाच

इति रणरभसस्य कत्थत; स्तदुपनिशम्य वचः स मद्रराट् |  ६१   क
अवहसदवमन्य वीर्यवा; न्प्रतिषिषिधे च जगाद चोत्तरम् ||  ६१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति