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आदि पर्व
अध्याय २१५
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वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणो वहुभोक्तास्मि भुञ्जेऽपरिमितं सदा |  २   क
भिक्षे वार्ष्णेय़पार्थौ वामेकां तृप्तिं प्रय़च्छताम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति