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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
धनञ्जय़स्तु श्रुत्वैतत्केशवस्य महात्मनः |  १८   क
प्रेक्षतो भीमसेनस्य हस्तेनोरुमताडय़त् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति