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आदि पर्व
अध्याय ७२
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कच उवाच
आर्षं धर्मं व्रुवाणोऽहं देवय़ानि यथा त्वय़ा |  १८   क
शप्तो नार्होऽस्मि शापस्य कामतोऽद्य न धर्मतः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति