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वन पर्व
अध्याय १४७
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वैशम्पाय़न उवाच
स वाक्यं भीमसेनस्य स्मितेन प्रतिगृह्य तत् |  ४   क
हनूमान्वाय़ुतनय़ो वाय़ुपुत्रमभाषत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति