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सभा पर्व
अध्याय ४९
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दुर्योधन उवाच
यथातिमात्रं कौन्तेय़ः श्रिय़ा परमय़ा युतः |  २२   क
राजसूय़मवाप्यैवं हरिश्चन्द्र इव प्रभुः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति