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वन पर्व
अध्याय २२
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वासुदेव उवाच
विशीर्णगलितोष्णीषः प्रकीर्णाम्वरमूर्धजः |  २४   क
प्रपतन्दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रहः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति