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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
निवर्त्य च वनात्पार्थमानाय़्य च जनार्दनम् |  १५   क
व्यूढानीकान्महाराज जवेनैव महाहवे |  १५   ख
धार्तराष्ट्रानमुं लोकं गमय़ामि विशां पते ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति