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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
एष भद्रे मय़ा मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि |  ५५   क
अरोगस्तव नेय़श्च सिद्धार्थश्च भविष्यति ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति