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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा भारत धर्मेषु धर्मज्ञैरिह दृश्यते |  २१   क
अहोरात्रं महाराज तुल्यं संवत्सरेण हि ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति