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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वेदवचनं श्रूय़ते नित्यदा विभो |  २२   क
संवत्सरो महाराज पूर्णो भवति कृच्छ्रतः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति