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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
यच्च मा भाषसे पार्थ प्राप्तः काल इति प्रभो |  २७   क
अनृतं नोत्सहे वक्तुं न ह्येतन्मय़ि विद्यते ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति