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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरेणापि कौन्तेय़ निकृतिं पापनिश्चय़म् |  २८   क
हन्ता त्वमसि दुर्धर्ष सानुवन्धं सुय़ोधनम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति