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वन पर्व
अध्याय ७२
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वाहुक उवाच
पुण्यश्लोकस्य वै सूतो वार्ष्णेय़ इति विश्रुतः |  ११   क
स नले विद्रुते भद्रे भाङ्गस्वरिमुपस्थितः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति