वन पर्व  अध्याय ४९

वैशम्पाय़न उवाच

तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा सम्प्राप्तं धर्मचारिणम् |  ३०   क
शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजय़ामास धर्मराट् ||  ३०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति