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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
व्यस्मय़न्त ततो योधाः सर्वे तत्र समागताः |  २२   क
शरान्विसृजतोस्तूर्णं साधु साध्विति पूजय़न् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति