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विराट पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रकीर्णपर्णानि यथा वसन्ते; विशातय़ित्वात्यनिलो नुदन्खे |  १७   क
तथा सपत्नान्विकिरन्किरीटी; चचार सङ्ख्येऽतिरथो रथेन ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति