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विराट पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
शोणाश्ववाहस्य हय़ान्निहत्य; वैकर्तनभ्रातुरदीनसत्त्वः |  १८   क
एकेन सङ्ग्रामजितः शरेण; शिरो जहाराथ किरीटमाली ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति