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विराट पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
स पाण्डवं द्वादशभिः पृषत्कै; र्वैकर्तनः शीघ्रमुपाजघान |  २०   क
विव्याध गात्रेषु हय़ांश्च सर्वा; न्विराटपुत्रं च शरैर्निजघ्ने ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति