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शल्य पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे निर्मर्यादे विशां पते |  ३४   क
चतुरङ्गक्षय़े घोरे पूर्वं देवासुरोपमे ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति