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विराट पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
स पार्थमुक्तैर्विशिखैः प्रणुन्नो; गजो गजेनेव जितस्तरस्वी |  २३   क
विहाय़ सङ्ग्रामशिरः प्रय़ातो; वैकर्तनः पाण्डववाणतप्तः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति