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द्रोण पर्व
अध्याय ९९
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सञ्जय़ उवाच
ततो दुःशासनो राजञ्शैनेय़ं समुपाद्रवत् |  १   क
किरञ्शरसहस्राणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति