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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽव्रवीत्तदा मत्स्यस्तानृषीन्प्रहसञ्शनैः |  ४५   क
अस्मिन्हिमवतः शृङ्गे नावं वध्नीत माचिरम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति