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उद्योग पर्व
अध्याय ४९
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धृतराष्ट्र उवाच
के स्विदेनं वारय़न्ति शाम्य युध्येति वा पुनः |  ३   क
निकृत्या कोपितं मन्दैर्धर्मज्ञं धर्मचारिणम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति