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वन पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां च पृथिवी विभो |  ४७   क
जठरं ते इमे लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति