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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैराचितं शुभैः |  २७   क
महद्भिस्तोय़कलशैः कठिनैश्चोपशोभितम् |  २७   ख
शरण्यं सर्वभूतानां व्रह्मघोषनिनादितम् ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति