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वन पर्व
अध्याय २५
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युधिष्ठिर उवाच
ममाप्येतन्मतं पार्थ त्वय़ा यत्समुदाहृतम् |  १२   क
गच्छाम पुण्यं विख्यातं महद्द्वैतवनं सरः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति