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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभम् |  ३०   क
जलजं पाञ्चजन्यं वै प्राणेनाहमपूरय़म् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति