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भीष्म पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
ततः स विपुलं चर्म शतचन्द्रं च भानुमत् |  ३०   क
खड्गं च विपुलं दिव्यं प्रगृह्य सुभुजो वली ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति