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द्रोण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु निहते वीरे सौभद्रे रथय़ूथपे |  १   क
विमुक्तरथसंनाहाः सर्वे निक्षिप्तकार्मुकाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति