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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
नेदुर्दुन्दुभय़श्चापि समन्तात्सुमहास्वनाः |  ५४   क
मारुतश्च ववौ युक्त्या पुण्यगन्धो विशां पते ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति