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द्रोण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
नो चेद्धि वय़मप्येनं महीमनुशय़ीमहि |  १४   क
वीभत्सोः कोपदीप्तस्य दग्धाः कृपणचक्षुषा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति